आमदरामस्ों का कज्व है हि सब पर, बंग दंपती उसका महससा चुका रहे हैं

February 11, 2020 | Reflections

इस चुका है। संगठन का नाम ‘सच्व’ है, सोसा्य्टी फॉर एजुकेशन, एक्शन एंड ररसच्व इन कम्युपन्टी हेलथ। और 55 एकड़ में बना उनका खूबसूरत कैमिस कहलाता है ‘शोधग्ाम’। अलग-अलग क्ेत्रों के ्युवा प्रोफेशनल को पजसने अिने ्यहां आकर रहने, काम करने, समाज की असाध्य िरेशापन्यों को हल करने के पलए अनुसंधान और प्र्योग करने को प्रोतसापहत पक्या। ्टीम की लगन और प्रपतबद्धता अनुकररी्य है। मैं जब वहां थी तो एक सज्वरी कैमि चल रहा था, पजसके पलए सज्वन दूर-दूर से श्रमदान करने आए थे। डॉक््टस्व ने मुझे बता्या पक वह श्रमदान उनके पलए नई सफकूपत्व भरने वाला था, संतोर्जनक अनुभव पजसे वह बार-बार दोहराना चाहेंगे। मरीजों का कहना था पक वह ्यहां इसपलए आए हैं क््योंपक ्यहां उनहोंने बेहतरीन मेपडकल के्यर के साथ द्या और गररमा का अनुभव पक्या है।

पजसने मुझे सबसे ज्यादा प्रभापवत पक्या वह ्ये पक बंग दंिती ने अंध पवचारधारा में अिने दृशष््टकोर को कठोर नहीं पक्या। उस वक्त जब देश में अत्यपधक ध्ुवीकरर हो रहा है, तब इस खुले पवचारों वाले संगठन का पमलना सुखद है।
सच्व ने अिनी वैज्ञापनक पजज्ञासा और साक््य आधाररत दृशष््टकोर के साथ-साथ मानवतावादी धाररा को बरकरार रखा है। डॉ रारी अिने पदल की ज्यादा सुनती हैं और डॉ अभ्य पदमाग से चलते हैं।औरउनदोनोंसेजबगलतीहोतीहैतोवह उसे मानने से डरते ्या पझझकते नहीं हैं। डॉ अभ्य कहते हैं बतौर वैज्ञापनक वह पसकल सेल के मामलों िर ररसच्व करना चाहते थे। िर उनहें समझ में आ्या पक ्यह आपदवासी समुदा्य की मूलभूत समस्या नहीं है। पनमोपन्या, पशशु मृत्यु और नशे की लत िर काम ज्यादा जरूरी था। पजस अनुसंधान की शुरुआत आपदवापस्यों के पलए हुई थी अब वह उनके जीवन से जुड़ ग्या था। ्यहां ट्रेपनंग ले चुकी
अंजना बाई गव्व से कहती है पक उनकी देखरेख मेें पिछले कई सालों में एक भी बच्े की मौत नहीं हुई है।वहमुझेएकनवजातबच्ेकेघरभीलेगईं। छो्टरे बदलावों से ्यह संभव हो िा्या है। नई माएं िहले बच्ों को पबना किड़ों के रखतीं थीं पजससे उनहें हाईिोथपम्व्या का खतरा रहता था। आज िररवार और हेलथ वक्कर बच्ों की पन्यपमत देखभाल करते हैं। ्टीम ्यह सुपनशशचत करने के पलए कड़ी मेहनत करती है पक वह अिनी धारराएं आपदवापस्यों िर न थोिंे। सरकार के साथ पमलकर चलाए जा रहे प्रोग्ाम मुशक्तिथ के जररए शराब और तमबाककू िर खच्व को काफी कम कर पद्या ग्या है। पजस िर सरकारी सकीमों से भी ज्यादा खच्व होता था।
कुछ ही सालों िहले तक ्यह नक्सलवाद का गढ़ था। जब सथानी्य आपदवापस्यों को नक्सपल्यों और िुपलस के बीच जारी पशकंजे के चलते मुखपबरों की खोज में फंसा्या जाता था। आसिास के जंगलों में अभी भी कई क्ांपतकारी पछिे हैं। उनकी पवचारधारा के पलए सरकार के हसतक्ेि से ज्यादा प्रपतसिधा्व बंग की पनरंतर क्ांपत है। वह क्ांपत जो गोंड आपदवापस्यों के उतथान और समृपद्ध के पलए पनसवाथ्व तौर िर प्रपतबद्ध है। आज वह गढ़पचरौली जहां िहले सुरपक्त िहुंचना भी असंभव था, धीरे-धीरे देश की मुख्य धारा से जुड़ रहा है। अब कॉलेज, दुकान और असिताल हैं, अचछी सड़क और कनेशक््टपव्टी भी है। लेपकन क््या आपदवासी हमारी तरह आधुपनक बनेंगे? ्या हमारे िास उनसे सीखने की सहूपल्यत होगी? ्यह सवाल अनुत्ररत है। गढ़पचरौली से लौ्टते हम ले आए हैं खूब सारी शुद्ध हवा अिने भीतर भरकर। हम शुकरान हैं महुआ, तेंदू और सागौन के उन िेड़ों के, उन गोंड आपदवापस्यों के जो इन प्राचीन जंगलों के पखदमतगार रहे हैं। इन आपदवापस्यों का हमारे देश िर बड़ा कज्व है। और बंग दंिपत उसका एक छो्टा सा पहससा चुकाने की कोपशश सालों से कर रहे हंै।
नए दशक की शुरुआत में खुशपकसमती

से मुझे एक प्राचीन इलाके में जाने का मौका पमला जो अिनी हापल्या िरेशानी से उबर रहा है। पवदभ्व का गढ़पचरौली, भारत के सबसे पिछड़रे आपदवासी पजलों में से एक है। वहां गोंड आपदवापस्यों के वनक्ेत्र में देश के 8 करोड़ आपदवापस्यों की तरह ही गोंड लोगों का सामना भी अशसततव से जुड़रे सवालों से होता है। आधुपनक अपतक्मरकारी दुपन्या के साथ उनहें पकतना आतमसात करना चापहए? वे अिनी िुरातन सांसककृपतक प्रथाओं को कैसे पजंदा रख सकते हैं, जो जंगल से कसकर जुड़ी हैं? वह िारंिररक ज्ञान को आने वाली िीपढ़्यों में कैसे संरपक्त कर सकते हैं, पजनकी महतवाकांक्ाएं तेजी से बदल रही हैं?

34 सालों से इन समुदा्यों के साथ जीने और काम करनेवाले डॉ अभ्य और रारी बंग ने भी इन सवालों को महसूस पक्या है। वह गांधी जी और पवनोबा भावे से गहरे प्रभापवत हैं। अमेररका से डॉक््टरी की िढ़ाई करनेवाले इन दो लोगों ने सवास्थ्य जैसी बुपन्यादी ज़रूरतों िर ध्यान केंपद्रत पक्या है। साल दर साल जो देखा, सुना, िढ़ा उसकी बदौलत हेलथ प्रैशक््टस के ऐसे मॉडल तै्यार पकए हैं जो समुदा्य की ज़रूरतों से वासता रखते हैं। नतीजे शानदार हैं, पशशु मृत्युदर कम हुई है और बाकी बीमारर्यों का बोझ ऐसे सतर िर िहुंचा चुका है जहां वह देशभर में ही नहीं बशलक बाकी देशों खासकर अफ्ीका में मॉडल बन

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आमदरामस्ों का कज्व है हि सब पर, बंग दंपती उसका महससा चुका रहे हैं

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