The jewelled Aghanashini: It’s the last major free flowing river of peninsular India, don’t put the squeeze on it

The jewelled Aghanashini: It’s the last major free flowing river of peninsular India, don’t put the squeeze on it

May 10, 2019 | Environment

For its entire 124 kilometres, this jewel of a river flows free. It is probably as old as the Western Ghats, older than the Himalayan range. Though not especially long, this west flowing river has a volume of water equal to the bigger Kali or Sharavathi rivers nearby. It originates in Shankara Honda in the town of Sirsi and meanders clean and clear through gorges, unique swamps, ancient forests and agricultural fields, till it flows to the Arabian Sea at Kumta, in Uttara Kannada district, Karnataka. Its forest floors are carpeted by bioluminescence, its estuary is rich with bivalves, crabs and mangroves harbouring dozens of varieties of fish.

Because of its gradient, it is the site of many spectacular waterfalls, like the Unchalli Falls, near which, on a full moon night in winter, you might even glimpse a moonbow – a rainbow generated from the moonlight. This is the river Aghanashini – ‘the cleanser of sins’.

This peninsular river is unique, because it is free flowing, unpolluted and retains its millennia old natural course. Most rivers in India are not free; they are dammed, or forced into channels. Others have just given up because their catchments have been destroyed; their drainage paths encroached upon. Most of our rivers do not even reach the sea anymore. Yet the hydrological cycle and the monsoon depends on rivers flowing to the ocean. A prevalent hydro schizophrenia refuses to acknowledge this reality, and we continue to build infrastructure along our rivers.

For the lakhs living along its banks, the Aghanashini has given people life and livelihoods. Even today, around 2 lakh households are directly dependent on the estuary, famed for its protein rich bivalve, crab and shrimp harvest. For the thousands of pilgrims that come to its many sacred spots, the river offers spiritual solace. For the growing number of tourists and researchers, the Aghanashini tract offers unique sights. Its sacred groves where trees have never been felled, its dense mangroves, its endangered lion-tailed macaque that came 5 million years ago, its tribal populations like the Halakkis that keep the Yakshagana art form alive; its appemidi wild mangoes that make the best pickles; its salt and pest resistant kagga rice – the list is endless.

Periodically, infrastructure is planned along this free flowing river of peninsular India. Once, industrial salt production was tried and abandoned. Then came a hydroelectric project, a thermal power plant, a port and a scheme to divert the river water for faraway towns.

People poured out in strong and sustained protests; people from every walk of life – ecologists, spiritual leaders, and fisher folk. The plans were shelved. The river ran free.
Now, a mega all weather port is once again imagined at its estuary, as part of Sagarmala. This port, which will expand the existing small Tadri port, will be built at an expense of about Rs 40,000 crore.

Karnataka already has 13 ports along its 300 km coastline, out of which one, Mangaluru, is a major port handling the bulk of shipments to and from the state. It is not clear on what basis the state expects Tadri port to be viable when nearby ports remain underutilised.

Just 25 km north is the Belekeri port, which was used to export iron ore and import coal before the industry collapsed. Just 25 km south is the Honnavar port, with a recorded maritime history going back centuries. Both these are well connected through the Konkan railway line and NH-17.

While it is unclear whether this port will ever be economically viable, environmental clearances have speeded up, with the usual contestations over what the reports left out in terms of the natural wealth of the region, and what would be lost through the creation of this port.

Meanwhile, the economic and future proofing opportunities created by the river and its catchments have not been properly documented. With its extreme natural beauty, just the potential of eco-tourism, if properly handled, could yield substantial revenue. The Western Ghats together with the sand and mangroves at the estuary are also effective carbon sinks. They provide untold ecosystem services in the region, including flood and erosion prevention.

If the port is built, it will require extensive dredging, as the current water depth is hardly two metres at the estuary. For ships to dock, it will have to be dredged up to almost 20 metres, releasing a vast amount of carbon rich soil and sand. Who will benefit? We often destroy ecology-based livelihoods in the name of employment creation. Who will be accountable when the marine production drops, as has been the experience at ports close by?

Economic discipline requires an ecological discipline as well. If we go ahead with each and every port designed for the Sagarmala project, we may create stranded assets and waste billions of dollars in underutilised infrastructure. Exactly the same result is visible in the Himalayas where dam after dam was built without making a holistic, scientific assessment of the total impact on the land and the economy.

In this great nation of saints and poets, public administrators and ingenious architects, has our national and local imagination shrunk so much that we cannot leave the last major free flowing river of peninsular India alone, for future generations to explore, enjoy and benefit from? Let the Aghanashini flow with Aviral, Nirmal Dhara.

Times of India

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हम अपने बच्चों को प्राकृतिक संपदा विरासत में दें

हम अपने बच्चों को प्राकृतिक संपदा विरासत में दें

April 27, 2019 | Environment

जिम्मेदारी… अगर बच्चा प्रकृति के साथ समय नहीं बिताता तो उसमें अवसाद की आशंकाएं बढ़ जाती हैं

रोहिणी निलेकणी
फाउंडर और चेयरपर्सन, अर्घ्यम

माता-पिता के रूप में, जब हम अपनी विरासत के बारे में सोचते हैं कि हम अपने बच्चों के लिए क्या करेंगे तो अक्सर दिमाग में भौतिक धन जैसे कि गहने, घर, कार या फिर कैश का ख्याल आता है। लेकिन आने वाले कल को देखते हुए यह महत्वपूर्ण है कि हम अपने बच्चों और पोते-पोतियों के लिए सिर्फ आर्थिक संपदा नहीं बल्कि जैविक संपदा भी विरासत के रूप में छोड़कर जाएं। जिस तरह हम अपने परिवार की संपत्ति की परवरिश करते हैं, क्या हम उसी तरह प्राकृतिक संपदा की परवरिश कर सकते हैं?

हम जब कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, अपनी बचत का निवेश करते हैं और उसे बढ़ता देखकर हमें गर्व महसूस होता है। तब हमारे पास आनंद लेने के लिए भी कुछ होता है और पीछे छोड़कर जाने के लिए भी। क्यों न हमारी परवरिश ऐसी हो कि हमें पेड़-पौधे और जानवरों की प्राकृतिक दुनिया को पुनर्स्थापित और विकसित करने में भी वही संतुष्टि मिले? मुझे जब भी मौका मिलता है मैं जंगलों में जाना पसंद करती हूं। जब मैंने पक्षियों से प्यार करना सीखा तब मैंनें पहले से ज्यादा खुश और शांत रहना भी सीखा। हमारे दिलों की गहराई और बायोलॉजी में प्रकृति और जीवित प्रणालियों के लिए लगाव होता है। जीव विज्ञानी ई.ओ विलसन ने इसे “बायोफीलिया’ बताया है। कुछ लोग कहते हैं कि बायोफीलिया मानव जाति के भविष्य की कुंजी है। यदि हम शहरों में रहते हैं, तो हमारा बायोफीलिया जताना मुश्किल होता है। शहरों में भीड़, कंक्रीट, कचरा और प्रदूषण हैं। झीलें और नदियां, नालियों में तब्दील हो गई हैं, हरे-भरे स्थान या तो घट रहे हैं या फिर दरवाजों के पीछे बंद हैं। लेकिन इस समृद्ध प्रकृति वाले देश में कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप कहां रह रहे हैं, क्योंकि हम प्रकृति के उपहारों से ज्यादा दूर नहीं हैं। चाहे वह जंगल हो या घास का मैदान, रेगिस्तान हो या रेनफॉरेस्ट, या वेटलैंड। शहरी इलाकों में भी पार्क, तालाब और पेड़ हैं। सिर्फ एक बड़ा बरगद या पीपल का पेड़ एक मिनी इकोसिस्टम की तरह है, जो कई पक्षियों और छोटे जीवों की मेजबानी करता है। वातावरण को शीतल रख सकता है।

हम अपने बच्चों को बाहर ले जाकर जीवन के अलग-अलग रूप दिखा सकते हैं और बता सकते हैं कि ये सभी रूप किस तरह से पर्यावरण के अनुकूल ढल जाते हैं। शायद इससे आने वाली पीढ़ी को समझने, उससे प्यार करने और इको क्षेत्रों की सुरक्षा करने में मदद मिलेगी, जिस पर उनका भविष्य निर्भर होगा। शहरी बच्चों को विशेष रूप से उन वयस्कों की आवश्यकता होती है जो प्राकृतिक दुनिया को देखने में उनकी मदद कर सकते हैं। इस बात के कई सबूत हैं कि जो बच्चे प्रकृति से दूर रहकर बड़े होते हैं उनमें व्यावहारिक रूप से या फिर कई दूसरे तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं, जो उनके लिए हानिकारक हो सकते हैं। रिचर्ड लोव नाम के एक लेखक ने इसे प्रकृति की कमी के कारण होने वाला विकार, “नेचर डेफिसिट डिसऑर्डर’ बताया है। उनका मानना है कि अगर बच्चा प्रकृति के साथ पर्याप्त समय नहीं बिताता तो उसके चिंता या अवसाद में होने की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। इस देश की दार्शनिक जड़ों तक अगर हम जाएं तो भी यही सच हमारे सामने आएगा कि हम इस धरती से हैं, यह पृथ्वी और ग्रह हमसे नहीं हैं। जंगल हमें प्राकृतिक दुनिया में व्यापक और गहरे संबंधों को समझने की अनुमति देता है, जिस दुनिया का मनुष्य केवल एक छोटा और कमजोर हिस्सा है। क्योंकि जंगलों की दुनिया केवल सुंदरता के बारे में नहीं है बल्कि शहरी, कृषि और आर्थिक क्षेत्र कहीं न कहीं एक ऐसे पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े हैं जो पूरी तरह से प्रकृति पर निर्भर है। चाहे वह पानी, औषधीय पौधों, अपशिष्ट प्रबंधन, जंगली खाद्य पदार्थ या फिर मछली पालन हो, इन सबके लिए हमें जैव विविधता की आवश्यकता है। जब युवा इस बात को बौद्धिक और भावनात्मक दोनों स्तरों पर समझने लगेंगे, तो वे भी इसमें भागीदारी करने लगेंगे।

पिछले साल से दुनिया भर के बच्चे, लोगों को यह बताने के लिए सड़कों पर आ रहे हैं कि हमें धरती को ग्लोबल वार्मिंग से बचाना है। वे समझते हैं कि जलवायु परिवर्तन होने लगा है और वे अपना भविष्य बचाने के लिए अब तुरंत कोई एक्शन चाहते हैं। भारत में, बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है। गर्मियों की छुट्टियां परिवारों के लिए प्रकृति के बीच जाने और यह समझने का एक अच्छा समय है कि ऐसा क्या है जो पहले से मौजूद है और हमें उसकी रक्षा करनी है। यदि बच्चे गर्मी में बाहर नहीं जा सकते हैं, तो घर के अंदर भी करने के लिए बहुत कुछ है। हमारे अपने घरों में और उसके आस-पास जीवन एक आश्चर्यजनक मात्रा में छिपा हुआ है जिसे बारीकी से देखकर बहुत कुछ समझा जा सकता है। कीड़े, पक्षी और छोटे जानवर हर जगह हैं, जैसे कि पौधे और पेड़ हैं। कई आकर्षक और डिजिटल तरीके भी हैं जिनके माध्यम से आप खुद को जंगल से जोड़ सकते हैं। कई लोग टीवी चैनलों पर वाइल्ड लाइफ डॉक्यूमेंट्री देखते हैं। कुछ वर्चुअल रिएलिटी वीडियोज भी हैं, जो आपको शेरों और हाथियों के आमने-सामने ले आते हैं। इसे देख आप डर और उत्साह साथ महसूस करते हैं।

यह तकनीक सार्वजनिक पुस्तकालयों या कॉलेजों में मिलनी चाहिए, ताकि हजारों छात्र जंगल का अनुभव ले सकें। वेब आधारित प्लेटफॉर्म भी मौजूद है, जहां लोग जो भी देखते हैं उसे रिकॉर्ड कर सकते हैं, इससे समय के साथ जो कुछ हो रहा है उसकी बदलती तस्वीर बनाने में मदद मिलती है। उदाहरण के लिए सीजन वॉच पर बच्चे फूल खिलते, या पक्षियों का अंडे से बाहर निकलना दर्ज कर सकते हैं। जैसे ई-बर्ड एप है, जो लोगों को यह रिकॉर्ड करने का मौका देता है कि उन्होंने कौन-सा पक्षी देखा। भले ही वह मैना, बुलबुल या कौवा हो। जब कई लोग इसमें भाग लेते हैं, तो एक पैटर्न बनने लगता है और हम बहुत कुछ सीख जाते हैं। इससे लोग समझ गए हैं कि अब हमें भी अपने प्राकृतिक खजाने को बहाल करने के लिए अपने बायोफीलिया को फिर से खोजना होगा। फिर हमारे पास आनंद लेने के लिए भी कुछ होगा और अपने बच्चों के भविष्य के लिए बहुत कुछ छोड़ जाने को भी। आखिर यही विरासत भविष्य में सबसे मूल्यवान होगी।

Make India Climate Smart: We have big infrastructure plans but forget to review them through a climate change lens

Make India Climate Smart: We have big infrastructure plans but forget to review them through a climate change lens

January 24, 2019 | Environment

India will invest billions of dollars in public infrastructure over the next few years. Government policies also aim to massively increase private investments across sectors – manufacturing, services and agriculture. Each of these policies and investments will have time horizons spanning five to 50 years.

Examples of planned infrastructure include – 100 new airports with an investment of $60 billion, interlinking of rivers at a budget of Rs 5.5 lakh crore, a linked network of ports through Sagarmala at an outlay of Rs 4 lakh crore. At a different scale, just one project – the 29.2 km coastal road planned in one city, Mumbai – will cost Rs 10,000 crore.

All these initiatives will impact the lives and livelihoods of millions, and will compete for finite and scarce public resources. But are any of them being screened against the biggest existential threat humanity has ever faced – climate change? Unfortunately, the answer is NO.

Times of India

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Changing Coverage: An Assessment of the FEJI – ATREE Fellowships 2013-2017

Changing Coverage: An Assessment of the FEJI – ATREE Fellowships 2013-2017

May 17, 2017 | Environment

The Forum for Environmental Journalists in India and Ashoka Trust for Research in Ecology and the Environment have partnered to implement three years of journalism fellowships in India. Over the last three years, FEJI has tried to bridge the divide between the scientific community and journalists in order to bring the public the news it needs to make informed decisions about their political vote or economic spending. This report is an assessment of the work.

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Bengaluru is not inclusive: Rohini Nilekani

Bengaluru is not inclusive: Rohini Nilekani

February 12, 2017 | Environment

“The city is not inclusive. The elite and the poor have different ideas and their interests often compete with each other, leaving fewer means for them to protest together. That is why we see disparate protests. However, there are some issues like water and mobility that bring all of us together,” writer and philanthropist Rohini Nilekani said during the conversation on Bangalore vs Bengaluru: The Tale of Two Indian Cities, at The Huddle, here on Sunday.

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The Huddle 2017 – Bangalore vs Bengaluru: The Tale Of Two Indian Cities

The Huddle 2017 – Bangalore vs Bengaluru: The Tale Of Two Indian Cities

February 10, 2017 | Environment

Bangalore vs Bengaluru: The Tale Of Two Indian Cities with Rohini Nilekani, Philanthropist, Writer & Founder-Chairperson, Arghyam, Naresh Narasimhan, Architect, Vinay K Sreenivasa, Alternative Law Forum and Pawan Kumar, Film-maker. They are in conversation with T M Veeraraghav, Resident Editor, The Hindu Bengaluru.
The Huddle 2017 was held on February 10, 11 & 12 at ITC Gardenia, Bengaluru.

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Climate change conversation

Climate change conversation

August 8, 2016 | Environment

The author was in conversation with Rohini Nilekani, chairperson, Arghyam Foundation, R Sukumar, Professor, Centre for Ecological Sciences, MSc, J Srinivasan, Professor, Centre for Atmospheric and Oceanic Sciences, HSc and Kartik Shanker, director, ATREE and Dakshin Foundation.

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A call for de-growth

A call for de-growth

July 30, 2016 | Environment

A healthy debate on the impact of unbridled development was a key takeaway from the launch ofAmitav Ghosh’s latest book. Concern about the climate Was the focus.

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Climate change conversation – People know all, but refuse to act: Amitav Ghosh

Climate change conversation – People know all, but refuse to act: Amitav Ghosh

July 28, 2016 | Environment

The author was in conversation with Rohini Nilekani, chairperson, Arghyam Foundation, R Sukumar, Professor, Centre for Ecological Sciences, IISc, J Srinivasan, Professor, Centre for Atmospheric and Oceanic Sciences, R Sukumar, Professor, Centre for Ecological Sciences, IISc, writer Amitav Ghosh and Rohini Nilekani, chairperson, Arghyam Foundation, at the launch of Ghosh’s book The Great Derangement – climate change and the unthinkable,’ in the city on Wednesday.

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